Friday, December 15, 2017

उदासी में श्यामला हिल्स


श्यामला हिल्स स्थित बँगलें पर शांति थी ..वो भी शांत थे लेकिन चेहरे पर टहल रहे भाव दिलोदिमाग में चल रही परेशानी की चुगली कर रहे थे ...आँखे टीव्ही के पर्दे पर नुमाया हो रहे गुजरात चुनाव के एग्जिट पोल पर गडी थीं ...| पोल तो उन्ही की पार्टी के पक्ष में गाने गा रहे थे लेकिन शायद उनको यह खबर रास न आ रही थी ...
‘गुजरात खिसकता तो राहत मिलती’...बडबडाते हुए उन्होंने फोन को हाथ पर कस लिया | ‘हल्लो’ ...गूंजते ही वह फिर बडबडा उठे ..’किस्मत ही ख़राब है ..सोचा था कि गुजरात में भट्टा बैठेगा तो ..धीरे धीरे किनारे लगा देंगे ...लेकिन हाय..यह फूटी किस्मत’......| 
बिना उत्तर सुने उन्होंने लगभग खीझते अंदाज में फोन ऐसा काटा जैसे कि किसी का गला ही रेत डाला हो ..| 
रिमोट को आदेश हुआ तो उसने टीव्ही बंद करने का अपना फर्ज़ निभा दिया | वह भी सामने पड़ी टेवल पर पैर उपर कर सोचते हुए आड़े हो गए ..| कुछ वक्त बाद किसी ने दरवाजे की ओट से थोड़ा खखारते हुए झाँका...| आँख खुली तो अनमने होकर अंदर आने की अनुमति दे दी ...|
‘क्या करेंगे अब ?....अब दोनों पहलवान पेल डालेंगे लोकसभा चुनाव तक...’ बडबडाते हुए आने वाले ने पहला जुमला उछाल दिया सामने ..| उन्होंने कोई उत्तर न दिया तो आने वाले ने अपनी बात को फिर आगे बढ़ा दिया ...| ‘ सब कुछ पूछ कर करो ...कोई आजादी नही ...अब आने वाले चुनाव में टिकिट भी सारे उनके मन के ..तो हम क्या यहाँ भिंडी बोते रहेंगे ..’ | साफ़ समझ आ रहा था कि आने वाला भी मानसिक रूप से काफी पीडित है | अचानक अब वो बोले ..’ मेरा तो सब एक तरफा मामला ही था ..लेकिन अब कोफ़्त होने लगी है ...ऐसा लगने लगा है कि मै तो सिर्फ भाषण के लिए यहाँ बैठाया गया हूँ ..सत्ता तो नागपुर और दिल्ली से ही चलेगी ..’| 
तनिक साँस लेकर वह फिर तेज़ आवाज में बोले ..’अरे इतने साल जी जान से लगा रहा लेकिन अब तो लगता है कि ‘बाबा’ की तरह मुझे भी किनारे पर खड़ा कर दिया जाएगा ..’ | माना कि व्यापम,किसान आत्महत्या,महिला बलात्कार के मामले में अव्वल,अफसरशाही का हावी होना जैसे कई आरोप ज़रूर हैं लेकिन सब चलता है ..’| थोडा रुके और फिर सोफे से उठते हुए रिरियाते हुए बोले ..’सबको खूब दिया ..सबकी इच्छा पूरी की ..दिल्ली से लेकर नागपुर तक ...अरे मैंने भी अपना हिस्सा रख लिया तो क्या हुआ ?..आखिर मुझे भी मेरा भविष्य जो देखना है ..”
उनकी परेशानी झरझरा रही थी ...| अचानक बोले कि ..’रत्नों को बुलाया है..कुछ तो आगे की तैयारी करनी होगी ..”| 
शब्द पूरे भी न हुए थे कि अचानक सूट बूट में कुछ कन्हैया आ धमके | रत्न ऐसे ही थोड़े थे ...वह सब सियासत में आगे बनने वाले समीकरणों को समझ चुके थे | भांप गए थे कि तिल्ली का तेल निकल चुका है अब कोई फायदा नही | रत्नों ने टालू अंदाज में कहा कि ..” सर ..अभी तो सिर्फ संभावित परिणाम है ..असल तो आने दीजिये फिर देखतें हैं..”
रत्नों के उत्तर से उनको थोड़ी आशा की किरण दिखाई पड़ी | वो थोड़े से सामान्य हुए ..इधर रत्नों ने जल्द खिसकने में ही भलाई समझी ...अरे आखिर उन्हें तो नया दरवाजा पकड़ना था ....

Saturday, October 28, 2017

न मामा न ...आप इतने भी मामू नही ..

              मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अमेरिका की धरती पर जाकर दावा ठोंक दिया कि हमारी सड़कें आपकी सड़कों से बेहतर ..| फिर क्या था ...पान की दुकान,मीडिया,सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों में पहले तो हंसी के फव्वारे फूटे और फिर शुरू हो गई मामू जान की खिंचाई | क्या वाकई शिवराज जी भावना में बहकर बोल गए ? यह भी बहुत संभव  है कि फिर मामा के दावे के पीछे कोई सियासी मकसद हो ... या फिर सलाहकारों के  अतिउत्साह की बजह से यह हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो गई | आधिकारिक ट्वीट ठोंकने के बाद दावे को सत्य साबित करने के मंशा  से तुलना करने वाले अच्छी और बुरी सड़कों के फोटो भी सोशल मीडिया के माध्यम से पेश कर दिए गए | सच को परे रखकर सलाहकार और समर्थक लगातार मुख्यमंत्री के दावे को लेकर उलजुलूल तर्क पेश करते रहे | विदेशी मीडिया ने भी शिवराज के दावे की पोल खोलना शुरू कर दिया | लगता है रायता बनाया या फिर बनवाया ही इसलिए था कि फैलाया जाए सो जमकर फ़ैल गया ..वो भी आशा से ज्यादा ..| लेकिन क्या अच्छे अच्छो को पानी पिलाकर सियासी गली के किनारे तक पहुंचा देने वाले शिवराज वाकई इतने भावुक हैं ? शिवराज कोई अधपके नेता तो है नहीं जो अपने दावों के मतलब को न समझ सकें ..| या फिर शिव अपने राज़ में इतने अलमस्त हो गए हैं कि अब सारा कुछ चंद सलाहकार ही बुन रहें है |  अंदरखाने से यह भी खबर आती है कि  सलाहकारों ने अपने निज हित में बनते समीकरणों को बैठाने के लिए शिव से जो चाहा मुंह से उगलवा दिया और जो मन किया वो करवा लिया | शिवराज अपने क़दमों को खींच कर ही चलते हैं और कभी जोश में आकर फ्रंट फुट पर आ भी गए .... तो मजाक ही बना | 
   नौकरी के दौरान कुछ साल शाजापुर में गुजरे | वहां एक थानेदार साहब से थोड़ी नजदीकी हो गई | छेड़े थे तो समय गुजारने के लिए थाना मुफीद जगह होती थी | गप्पों के साथ मुफ्त की चाय उड़ाने का मौका हमेशा खुला रहता था | गप्पों के साथ थोडा सा ध्यान थानेदार साहब के थानेदारी करने के अंदाज पर रहता था | सब ठीक ठाक और कोई मोटा आसामी जद में आ गया तो थानेदार साहब काफी सक्रियता दिखा देते थे लेकिन यदि मसला उलझ गया या फिर कही गिरफ्त में आया कोई उन पर ही भारी पड़ गया तो बिल अपने चेले चपाटों पर फटना तय | तब यह मसला समझ से परे होता था या फिर यूँ कहिए कि मसले को समझने की कोशिश ही न की ..| अब थानेदार साहब और उनकी थानेदारी रह रहकर याद आती है ...| तनिक और स्पष्टता की ओर बढ़ लिया जाए तो कहावत है 'ऐडा बनकर पेडा खाना' ... इतना तो कहा ही जा सकता है शिवराज कम से कम ऐडे तो नहीं हैं लेकिन कुछ मिलते जुलते अंदाज में पेडे ज़रूर खाते रहें हैं | संभव है कि सलाहकार बेचारे फ़ालतू में ही लक्ष्य बनते रहे हो जबकि खेल अपने मामू का ही हो  | कुछ अच्छा हुआ तो कोई बात नही लेकिन मसला फंसा तो सलाहकार का सिर है ही ठीकरा फोड़ने के लिए ..| 
   

Friday, October 20, 2017

बंटता लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ

रोज़मर्रा की तरह दफ्तर के काम निपटाने के बाद गाड़ी के पहिए घर की दिशा में तेज़ी से लुढ़क रहे थे । मोबाइल अपना मूल काम छोड़कर फिलहाल किशोर दा के गाने सुना रहा था । दफ्तर से घर की ओर का कुछ फासला ही तय हुआ होगा कि अचानक मोबाइल बाबू संगीत सेवा छोड़कर मूल काम पर आ गए । श्रीमती जी का संदेश था । तत्काल फोन गाड़ी के डेश बोर्ड का स्थान छोड़ कान पर आ चिपका । श्रीमती जी ने वन लाइनर अंदाज में अपनी बात रख दी..। "कब तक आ रहे हो ? औऱ आते हुए डीटीएच रिचार्ज ज़रूर करवा देना ..। उत्तर की औपचारिकता के बाद फोन पुनः अपनी संगीत सेवा में जुट गया और गाड़ी ने डीटीएच रिचार्ज वाली दुकान की ओर रुख कर लिया ..। 
रिचार्ज की यह दुकान कई साल से तय थी लिहाजा दुकान मालिक से पहचान भी खासी थी । रिचार्ज के साथ पन्द्रह बीस मिनिट की गप्पें हो ही जाती थी । नमस्कार और हालचाल की औपचारिकता के बाद रिचार्ज का आदेश कर दिया अपन ने...। रिचार्ज होने की प्रक्रिया के साथ ही गपियाना शुरू हो गया ..। मस्त गप्पों में व्यवधान डाला एक अन्य ग्राहक महोदय ने..। साहब को नया डीटीएच चाहिए था ..। दुकानदार शायद पहले से ही ग्राहक को और उनकी पसंद - नापंसद को अच्छी तरह से जानता था ...सो तत्काल ग्राहक की पसंद के अनुसार एक कंपनी की डीटीएच सेवा की तारीफ करते हुए एक विशेषता और पकड़ा दी कि.."सर...इसमें वो सभी न्यूज चैनल आते है,जो अपने वाले है....।
"चैनल..अपने वाले"...यह लाइन अपने समझ के बूते से बाहर थी..। अरे खबरिया चैनल तो खबर ही देंगे...अपने और पराए का इसमें क्या मसला...? खैर ग्राहक इस विशेष जानकारी हासिल करने के बाद खुश हो गया और सौदा चन्द मिनिट में परवान चढ़ गया...।
घर जाने के जल्दी थी लेकिन अपने और पराए चैनल की फर्क की पहेली जानने को मैं विवश हो गया ..। ग्राहक के रवानगी डालते ही मैंने बिना कोई देर किए अपने सवाल को दुकानदार की ओर उछाल दिया ..। दुकानदार मुस्कराया और धीमे से बोला सर यह सब ग्राहकी की कला है....लेकिन आयडिया आप पत्रकारों के वजह से ही आया । मुझे उत्तर जानना तो दो टूक पूछा कि भाई सीधे सीधे बताओ ....आखिर मतलब क्या...
दुकान वाले ने जो बताया वो मेरे जैसे खबरची के लिए झटके वाला था । दुकानदार ने स्पष्ट किया .."देखिए सर..सभी खबरिया चैनल किसी एक डीटीएच पर तो हैं नही और फिर सस्ते महंगे की मगजमारी..... इसलिए मैंने के नया फ़ंडा निकाला है कि जब ग्राहक आता है .... यदि वह पहचान का है तो कोई समस्या नही और यदि अजनबी है तो पांच से दस मिनिट राजनीति की बात करता हूँ ...। इस दैरान मुझे समझ आ जाता है कि उसकी विचारधारा और झुकाव के बारे में...फिर उसी की पसंद के अनुसार उत्पाद थमा देता हूँ ।
मैं उसके ग्राहक ज्ञान को समझने की कोशिश कर रहा था...लेकिन दुकानदार समझ गया कि मेरे ऊपर के माले में बात अब तक समझ नही आई...सो फिर उसने समझाने के अंदाज में बोला....सर देखिए..यदि कोई सत्ता पक्ष के प्रति झुकाव रखता है तो तत्काल जी टीव्ही,आजतक, जी हिंदुस्तान,इंडिया टीव्ही,रिपब्लिक जिस पर आते है वो वाला डीटीएच बता देता हूँ और जो मोदी को पानी पी पी कर कोसते है उन्हें एनडीटीवी,टाइम्स नाउ जैसे चैनल जिस डीटीएच प्लेटफॉर्म पर मौजूद है वो आगे बढ़ाता हूँ..।
ज्ञानवान दुकानदार ने अपनी बात को औऱ स्पष्ट किया...सर जो सत्ता पक्ष प्रेमी है वह कड़वी सच्चाई को भी दरकिनार करके सिर्फ और सिर्फ सरकार की तारीफ ही सुनना चाहता है तो वही जो विपक्ष की विचारधारा से प्रभावित हैं तो वह किसी भी कीमत पर यह मानने को तैयार नही कि देश में तनिक भी कुछ अच्छा काम बीते तीन सालों में हुआ है..बस मोदी निंदापुराण में ही उनको काफी सुकून मिलता है...। चैनल भी बंट गए है कोई खबरिया चैनल सिर्फ भक्ति में व्यस्त होकर देश की दिन दूनी रात चौगनी तरक्की का राग अलापता रहता है तो कुछ चैनल हर तरफ सिर्फ बर्बादी और बर्बादी का रोना रहते है । कुल जमा हर चैनल का अपना एजेंडा सेट है और उस एजेंडे के लिए पत्रकारिता के मापदंडों की पुड़िया बनाकर अपने राजनीतिक आकाओ के चरणों में समर्पित कर चुके हैं ।
दुकानवाला इस फंडे को समझ गया लेकिन हम खबरची लोग समझते हुए भी नासमझ बनकर मोहरा बनते जा रहें है । असल खबर पर्दे से बाहर है । खबर पर्दे पर वही है जो सियासतदां चाहते हैं । मीडिया मालिकान चाँदी काट रहें हैं । आम लोग गुमराह हो रहे हैं । पत्रकारिता लगभग दम तोड़ चुकी है और चाटुकारिता शबाब पर आ गई है...।
शायद पढ़ने या सुनने में बात आम हो लेकिन ज़रा सोचिए लोकतंत्र का यह चौथा स्तम्भ यदि पूर्ण रूप से धराशाही हो गया तो इस देश का क्या भविष्य होगा...?
गाड़ी के पहिए फिर से घर की दिशा में लुढ़कने लगे लेकिन दिमाग तो मानो दुकान पर ही उलझ कर राह गया था......
उफ्फ्फ...

Wednesday, August 23, 2017

आगाज़ एक नई सुबह का

मंगलवार की सुबह का सलमा को बेसब्री से इंतज़ार था । अहम फैसला जो आने वाला था । सलमा,बीते चार साल से अपनी ज़िदगी कम से कम जी तो न रही थी...वो तो, बस घसीट रही थी । अरमान दफन हो गए थे और उम्मीद की साँसे उखड़ने लगी थी । अरे गलती ही क्या थी उसकी...दिन भर कामकाज में खटने के बाद बिस्तर पर पड़ते ही मानो जिंदा लाश में तब्दील हो जाती । परिवार में नौ लोगों का हुक्म बजाते बजाते ..दिन कब फुर्ररर हो जाता....उफ्फ ..सच पता ही न चलता । 
    दिन भर चप्पलों को तकलीफ देकर और देर रात भोपाली पटियों को आबाद करने के बाद घर पर आमद दिए सलीम को अपना हक़ चाहिए होता । सलमा को तो अपने सरताज का हर हुक्म मानो ऊपर वाले का फरमान होता । 
 उस दिन बुखार था ...बदन जल रहा था । काम निपटा कर बस बिस्तर पर टिकी ही थी कि सलीम ने अपनी ख्वाइश उगल दी । बस आज नही......यही मुंह से उगला सलमा ने । इधर तो मानो शौहर के अहम को गजब चोट लगी और मुँह से उबाल आ गया 'तलाक-तलाक-तलाक'....। 
हालात जो भी हों लेकिन सिर पर छत तो नसीब थी सलमा को....लेकिन अब एक 'न' ने उसे बेघर कर दिया और रिश्तों से महरूम ...। 
    मॉफी मांगी । रहम की गुहार लगाई लेकिन अब क्या होता ...चन्द पलों में अब वह तलाकशुदा थी । अपनों की बीच जब सुनवाई न हुई तो  मजबूरन अदालत के दर पर दस्तक दे दी  । शुरू हुई हक की लड़ाई...
  आज फैसला आ रहा था..। धड़कने,सलमा का साथ नही दे रहीं थी...। अचानक ख़यालों को तोड़ा टीव्ही पर चीखती सीJ एंकर ने । फैसला आ गया । तीन तलाक..अब न होगा ...।
  सफेद पड़ चुके चेहरे पर हल्की से चमक फुदक आई,सलमा के..लेकिन कई सवालों के जबाब अभी भी ग़ुम थे....। उसके गुज़रे चार साल भी वापस मिलेंगे ? उसके साथ हुए अन्याय का जिम्मेदार कौन..? क्या अब कोई सलमा प्रताडित न होगी....? क्या नया कानून बनने से सब ठीक हो जाएगा...?
    कौन देता सलमा के जहन में सनसनाते सवालों का जबाब... । तलाक का जख्म उसने जिया था । जानती थी पीड़ा क्या होती है । 

  फैसला उसे सुकून न दे रहा था । अपनी जंग जीत जाने के बाद खुशी उसके दिल मे बसेरा न कर पा रही थी । सलमा की सोच... कानून की बजह से तलाक न होंगे यह मानने को तैयार न थी । अचानक मन के एक कोने से आवाज आई काश 'तलाक' को रोकने के लिए कानूनी डंडे की बजाए लोगो की जागरूकता आगे आ जाती तो कितना बेहतर होता...। उसे भी मालूम था कि किसी भी कुरीति के खात्मा के लिए कानून तो ठीक है बल्कि समझ की ज़रूरत ज़्यादा है । 
     टीव्ही पर कुछ महिला और पुरूष कुर्सियों पर टिके मुँह जुगाली कर रहे थे....लेकिन सलमा के दिल ने कुछ और फैसला ले लिया था ....अब,वह आज से समाज में जड़ जमा चुकी धर्म के नाम पर थोपी गई कुरीतियों के खिलाफ जागरूक करने का काम करेगी । 
   सलमा के चेहरे पर सुकून के भाव तैर गए । लगा उसको कि अब जिंदगी को नए मायने मिल गए....

Sunday, August 20, 2017

शौचालय की सोच को सरकारी ठेंगा

कुछ माह पहले ही भोपाल शहर को स्वच्छ शहरों की फेहरिस्त में दूसरी पायदान हासिल हुई थी | ख़ुशी से सीना चौड़ा हो गया था,सभी का.. | आश्चर्य थोडा ज़रूर हुआ था लेकिन फिर सोचा कि छोडो ...अपने मुख्यमंत्री गुणा भाग में तो माहिर है | जैसे हर साल फसल ख़राब होने के बाबजूद हमारे प्रदेश के पाले में ‘कृषि कर्मण अवार्ड’ आ जाता है कुछ वैसे ही इस मामले में भी ‘गोटी’ सेट हो गई होगी | खैर शहर को सम्मान मिला था तो कई सवाल झटक कर हमनें भी ख़ुशी मना ली | सारे गुणा भाग ठीक ठाक तो भोपाल दौरे पर आए पार्टी के तेज़ तर्रार राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी दिल खोलकर तारीफ की और मुख्यमंत्री जी के कामकाज को बिना 'जीएसटी' काटे पूरे सौ नंबर पकड़ा दिए |
     सारा सब कुछ बेहतर था लेकिन हाय री किस्मत ..राष्ट्रीय अध्यक्ष के दौरे के आखरी दिन ही खीर में कंकड़ आ गया | दरअसल अतिउत्साह में मुख्यमंत्री जी की टीम गुणा भाग भूल गई और अध्यक्ष जी को उस गरीब आदिवासी के घर भोजन के लिए ले कर पहुँच गए,जिसके घर शौचालय ही नहीं था | यह तो अच्छा हुआ कि राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का पेट ठीक था कही उनको ही शौच के लिए जाना पड़ जाता तो बेचारा मेजबान आदिवासी उनको भी लोटा पकड़ा कर दूर खेत का रास्ता ही दिखा पाता | ख़ास बात यह है कि यह घर कोई दूर दराज इलाके का नहीं बल्कि बिल्कुल राजधानी भोपाल से सटा है |
   दरअसल अमित शाह जी आज़कल जहाँ दौरे पर जाते है तो वह किसी गरीब दलित के घर भोजन करते हैं | समय कम था सो भोपाल से सटे सेवनिया गौड़ गाँव के आदिवासी कमल सिंह के घर पर भोजन का कार्यक्रम तय हुआ | कमल के पास न तो स्थायी रोज़गार है न ही खेती किसानी | छोटे मोटे काम करके जैसे तैसे अपने परिवार के साथ गुजर बसर कर रहा है | सरकारी दफ्तर में दस्तक दी थी लेकिन आज तक शौचालय न बन पाया |
  शाह साहब की तो किरकिरी हो ही गई लेकिन बेचारे प्रधानमंत्री जी को कितना बड़ा धक्का लगेगा | अमिताभ बच्चन को भी दुःख होगा कि देखो रोज़ मैंने टीव्ही पर भले ही करोडो रूपये लेकर ‘स्वच्छता’ का ज्ञान दिया लेकिन शिवराज जी के राम राज़ में उनकी कोई सुनवाई नही | यह तीनो भी ठीक है सबसे ज्यादा बुरी स्थिति तो अपने देश भक्त अभिनेता ‘अक्षय कुमार’ साहब की होगी | टीव्ही विज्ञापन के साथ साथ वह तो शौचालय के सोच में इतने पड़ गए थे कि एक पूरी फिल्म ही बना डाली | अब आखिर यह क्या बात हुई ,शिवराज जी ....आपने केंद्र से मिशन के नाम पर पूरे 427 करोड़ रूपये तो ले लिए लेकिन ‘शौच’ की सोच पर कतई ध्यान न दिया ..| इस मामले में भी आपकी कृपा बरसी तो...बस अफसरों पर
  अब इस मसलें को लेकर मप्र में स्वच्छता मिशन की असलियत,भोपाल का स्वच्छ शहर की दूसरी पायदान पर आना और मुख्यमंत्री जी के कामकाज को सौ फीसदी नम्बर मिलना ...एक साथ तीनो की पोल खुल गई | शाह साहब खाना खाकर सोचते सोचते निकल लिए ....| शाह साहब का भी मुगालता दूर हो गया होगा कि वह खुद बड़े फन्ने खां या फिर गुणा भाग वाले हैं | अब महसूस हुआ होगा कि उनसे भी बड़े वाले पड़े हैं | खैर शाह साहब समझ जाइए,ऐसे ही नही बोला जाता कि ‘एमपी अजब है सबसे गजब है’......|
#amitshah
#shahinmp
#shivrajsinghchauhan
#cmomp
#bjpmadhyapradesh

Saturday, August 19, 2017

शिवराज और शाहरुख की जन्मकुंडली की जुगलबंदी

'श' से ही शिवराज और ' श' ही शाहरुख खान । दोनों की जिंदगी को लेकर गजब संयोग है । दोनों ही अपनी मेहनत और काबलियत के बलबूते फर्श से अर्श तक पहुंचे । दोनों ने ही अपने अपने क्षेत्र में सफलता के परचम लहराए । शाहरुख फ़िल्म इंडस्ट्री के सबसे लोकप्रिय और नम्बर वन सुपर स्टार बने तो शिवराज ने राजनीति के क्षेत्र में लोकप्रियता के चरम स्तर तक पहुंच कर दिग्गज नेताओं की ज़मात में अहम स्थान बनाया ।
  अभिनेता शाहरुख खान ने अदाकारी का सफर टीव्ही सीरियल से शुरू किया और फिर जब बड़े पर्दे का रुख किया तो फिर पीछे मुड़ कर न देखा । शाहरुख की फिल्म मतलब सफलता की 100 फीसदी गारंटी । आखिरकार शाहरुख फिल्मी दुनिया के बेताज बादशाह बन गए....।
   नेता शिवराज की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई । भाषण कला में पारंगत और सहज़,मेहनती शिवराज अपने ही दम पर सफलता की सीढ़ी चढ़ते गए । संगठन में मिली विभिन्न जिम्मेदारियों को बेहतर अंजाम दिया तो सांसद बनकर दिल्ली पहुंचे । शिवराज सबकी पसन्द बन गए । परिणाम यह हुआ कि अचानक बने समीकरणों के बीच शिवराज सिंह मप्र के मुख्यमंत्री बन गए । शिवराज ने कुर्सी का हत्था ऐसा पकड़ा कि अब तक के सर्वाधिक कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री हो गए ।
     दोनों की जन्म कुंडली के सितारे लगता है एक समान ही चाल चल रहे है । अब जब शिवराज की लोकप्रियता का ग्राफ किसान आंदोलन,व्यापम घोटाला,अफसरों को नियंत्रण में न रख पाने के साथ कई अन्य आरोप के चलते काफी गिरा तो इसका प्रभाव नगरीय चुनाव परिणाम में साफ दिखा । सत्ता के गलियारों से लेकर संगठन तक शिवराज के खिलाफ नाखुशी अब सार्वजनिक होने लगी है  शिवराज की विदाई को लेकर आए दिन ख़बरों का बाज़ार गर्म होता है । जानकारों के अनुसार वर्तमान हालात में शिवराज काफी कमजोर हुए हैं और आने वाला समय उनके लिए काफी कठिन साबित होगा
      तो कुछ वैसे ही शाहरुख भी कई सुपर डुपर फिल्मों का स्वाद चखने  के बाद लगातार ढाल पर हैं । दिलवाले,फैन और हाल में आई 'जब हैरी मेट सैजल' जैसी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ दिया । फिल्मी पंडित शाहरुख को अब पिटा हुआ मोहरा कहने में भी नही चूक रहें है । थियेटर में दर्शकों का टोटा और फ़िल्म निर्माताओं की शाहरुख़ में अरूचि बिगड़ते समीकरणों की पोल खोलती हैं ।
     खैर नेता शिवराज और अभिनेता शाहरुख दोनों ही जीवन में एक बार फिर संघर्ष के दौर में हैं और अपने अपने मुकाम को बचाने के जुगत में जुटे है लेकिन "उफ्फ यह" किस्मत किसका कितना साथ देती है,यह तो भविष्य के गर्भ में है ।

Wednesday, August 16, 2017

शिवराज का दरकता जादू

  वर्तमान में घोषित #नगरीयनिकाय चुनाव के परिणामों ने #भाजपा सरकार की दरकती लोकप्रियता को स्पष्ट किया है तो साथ ही भविष्य के गढ़ते नवीन राजनैतिक समीकरणों की ओर भी संकेत दिया है । आशा से परे आए परिणामों ने मुख्यमंत्री #शिवराज सिंह के धड़कनें ज़रूर बढ़ा दी होगी ।  43 नगरीय निकाय चुनाव के नतीजों में 14 #कांग्रेस और 3 पर निर्दलीय ने कब्जा कर लिया । हालांकि 26 पर #बीजेपी ने दम दिखाया लेकिन शिवराज ब्रांड और सत्ता हाथ में होने के बाद भी 17 सीट हाथ से निकल गई । और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री जी ने इन चुनावों को गंभीरता से  लेते हुए 27 सीटों पर धुआंधार प्रचार किया था लेकिन परिणाम आए तो इनमें से 13 सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा है । कहा जाता था कि चुनाव में शिवराज की #सभा भर हो जाए तो सीट बीजेपी की झोली में आना लगभग तय... लेकिन लगता है कि शिवराज जी के जादू को नज़र लग गई । पहली बार शिवराज को इतना बड़ा झटका लगा | भाजपा को अब गंभीर मंथन की आवश्यकता है। अंदरखाने में मुख्यमंत्री बदलाव की कवायद और तेज़ी से शुरू हो गई है | बीजेपी के नेताओ का ही मानना है कि यदि बीजेपी फिर से सत्ता में आना चाहती है तो मुख्यमंत्री का चेहरे में भी बदलाव ज़रूरी है | 
बदले समीकरणों के बीच मुख्यमंत्री बने थे,शिवराज 
      कुछ महीने पहले ही  शिवराज ने सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड कायम किया है | सन 2003 में दस सालाना मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के काम को सिरे से खारिज करते हुए मतदाताओं ने बीजेपी के हाथ में सत्ता सौपीं | बीजेपी सरकार में पहले साध्वी उमा भारती को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली और फिर बाबूलाल गौर के हाथ में सत्ता रही | समीकरण तेज़ी से बदले और नए युवा चेहरे के तौर पर शिवराज सिंह नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री पर काबिज हुए | सत्ता हाथ में आते ही शिवराज का जादू पूरे प्रदेश में दिखने लगा | शिवराज महिलाओं के भैया तो बच्चो के मामा बन गए | कोई भी चुनाव हो तो लगभग जीत बीजेपी के पाले में  ही होती ...| 
     शिवराज ने अपनी मुख्यमंत्री की पारी की शुरुआत तो शानदार अंदाज में की | विनम्र,सहज,सरल संवेदनशील मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज का ग्राफ एक दम आसमान छूने लगा | सफलता की ऐसी झड़ी लगी कि शिवराज के सामने दिग्गज से दिग्गज नेता शुन्य होते दिखे | शिवराज के विकल्प के रूप में दूर दूर तक कोई चेहरा नही था | लेकिन शिवराज अफसरशाही से बचे न रह पाए | डम्पर मामला,व्यापम घोटाला,उज्जैन कुम्भ जैसे कई भ्रष्ट्राचार के मामलों का सच सामने आने लगा | पार्टी के नेताओ से लेकर कार्यकर्ताओं का आक्रोश अब सार्वजनिक होने लगा है |पिछले दिनों किसान आंदोलन ने तो मानो शिवराज सरकार की सारी छवि को तार तार कर दिया |
बदलाव की आहट 
   जल्द बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष #अमित शाह भोपाल में चौपाल ज़माने वाले हैं । पहले ही कयास लगाए जा रहे थे कि चौपाल में शिवराज के विरोध में सुर गूंज सकते हैं लेकिन  नगरीय निकाय के नतीजों के बाद अब तय है बैठक में शिवराज विरोधी भारी पड़ने वाले हैं । #संघ और मोदी-शाह की टीम के द्वारा जमा की गई रिपोर्ट में भी शिवराज का ग्राफ् तंदुरुस्त नही है । वैसे भी शिवराज #मोदी-शाह की गुडबुक में सार्वजनिक तौर पर शामिल हो सकते है लेकिन "वेवलेंथ" मेच नही होती है । पहले ठोस तौर पर माना जाता था कि मप्र में बीजेपी का चेहरा शिवराज के अलावा अन्य कोई हो ही नही सकता लेकिन अब जिस तरह माहौल बना हुआ है,उसमें चेहरा कोई खास हो यह कोई मायने नही रखता । बड़ा संभव है कि जल्द शिवराज की कर्मभूमि दिल्ली बन जाए और आने वाले समय में मुख्यमंत्री निवास में आयोजित  अन्य कोई चेहरा  'दीवाली मिलन समारोह' का मेजवान हो ....।
#mpbjp
#shivrajsinghchauhan
#nagriychunav

उदासी में श्यामला हिल्स

श्यामला हिल्स स्थित बँगलें पर शांति थी ..वो भी शांत थे लेकिन चेहरे पर टहल रहे भाव दिलोदिमाग में चल रही परेशानी की चुगली कर रहे थे ...आँखे ...